पश्चिम बंगाल में कोरोना पर भारी है राजनीति

पश्चिम बंगाल संभवतः अकेला ऐसा राज्य है जहां शुरुआत से ही कोरोना से ज़्यादा इस पर होने वाली राजनीति सुर्खि़यां बटोर रही हैं. हर बीतते दिन के साथ यह लगातार तेज़ हो रही है. दिलचस्प बात यह है कि सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस हो या फिर विपक्षी भाजपा, दोनों इस राजनीति के लिए एक-दूसरे को ही ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं.

कोरोना से होने वाली मौतों की पुष्टि के लिए बनी विशेषज्ञ समिति पर विवाद होने के बाद अब ममता बनर्जी ने इससे पल्ला झाड़ लिया है. उनका दावा है कि इसका गठन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने किया है और इसके गठन में उनकी कोई भूमिका नहीं है. सरकार ने भी अब इस समिति के अधिकार सीमित कर दिए हैं. अब कोरोना से होने वाली मौतों की पुष्टि के लिए समिति की मंजूरी जरूरी नहीं होगी. विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि कोरोना की मौतों को छिपाने के लिए ही इस समिति का गठन किया गया है.

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सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को राशन के वितरण में भी धांधली के आरोप लग रहे हैं. इस मुद्दे पर कई जगह हिंसा भी हो चुकी है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार पूरा राशन नहीं दे रही है और तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों को ही राशन मिल रहा है.

हालांकि तृणमूल ने इन आरोपों का निराधार बताया है. सरकार ने कहा है कि राशन पर राजनीति बंद नहीं हुई तो वह इसका वितरण रोक देगी. इस बीच, राज्यपाल ने शुक्रवार को एक बार फिर राज्य सरकार पर मौतों का आंकड़ा छिपाने का आरोप लगाया है.

फ़िलहाल बंगाल के रेड ज़ोन इलाक़े केंद्र और राज्य के बीच विवाद की ताजा वजह बन गए हैं पहले बंगाल के चार ज़िलों को रेड ज़ोन में होने की बात कही गई ती. लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ताज़ा सूची में 10 ज़िलों के नाम शामिल कर दिए हैं. इसके विरोध में अब राज्य सरकार ने केंद्र को पत्र भेजा है. इसमें कहा गया है कि राज्य के चार ज़िले ही रेड ज़ोन में हैं, दस नहीं.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की पहली सूची में कोलकाता, हावड़ा, उत्तर 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर ज़िले ही रेड ज़ोन में शामिल थे. लेकिन अब शुक्रवार को जारी ताज़ा सूची में रेड ज़ोन में शामिल ज़िलों की तादाद बढ़कर 10 हो गई है. जिन छह नए ज़िलों को इसमें शामिल किया गया है वह पहले आरेंज ज़ोन में थे.

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