MP Corona : ‘शिव’ के आदेशों पर कागजी घोड़े दौड़ा रहे अफसर

कोरोना महामारी के चलते लागू किए गए लॉकडाउन से पैदा हुए संकट से निजात दिलाने के लिए भले ही सूबे के मुखिया शिवराज सिंह ने मोर्चा संभाल रखा है, लेकिन उनके अफसर अब भी तुरंत मदद पहुंचाने की जगह कागजी घोड़े दौड़ाने में लगे हुए हैं। इस स्थिति में प्रदेश के किसानों, मजदूरों और अन्य जरूरतमंदों को सरकार सहायता नहीं मिल पा रही है। यही वजह है कि सरकार द्वारा जरुरतमंदों की मदद के लिए किए गए फैसलों व घोषणाओं के बाद भी व्यवस्थाएं नाकाफी साबित हो रही हैं। इन हालातों के चलते अब आमजन चाहते हैं कि मुख्यमंत्री अपनी घोषणाओं की हकीकत पता कर उस पर अमल कराएं। उधर अफसरों की लापरवाही और बेहतर प्रबंधन के अभाव में सरकार की छवि भी बिगड़ रही है।
गौरतलब है कि 23 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद सत्ता संभालते ही कोरोना के खिलाफ महायुद्ध का ऐलान कर दिया था। इसके साथ ही लागू हुए लॉकडाउन में प्रदेश की जनता को परेशानी से बचाकर राहत देने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय भी लिए। इसके बाद भी लॉकडाउन के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में निर्णयों के क्रियान्वयन को लेकर अफसर लापरवाह बने हुए हैं। पूरी तरह से निगरानी न होने की वजह से निर्णयों पर पूरी तरह से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। दरअसल, मुख्यमंत्री ने अफसरों को आदेश तो दे दिया, अफसर उन निर्देशों का पालन हो इसके लिए जो व्यवस्था होनी थी वह नहीं हुई। जिसके कारण ना तो किसानों की फसल बिक पा रही है, न गरीबों को राशन मिल पा रहा है, न ही गरीबों को दाल का भी वितरण नहीं हो पाया।

आयुर्वेदिक दवा और काढ़े का क्या हुआ
मुख्यमंत्री ने इम्युनिटी बढ़ाओ- कोरोना भगाओ के ध्येय के साथ लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने होम्यौपैथी, यूनानी, आयुर्वेदिक दवा और काढ़े का डोर टू डोर वितरण करने का निर्देश दिया था। लेकिन राजधानी में ही अधिकांश लोगों को इसके बारे में अब तक जानकारी नही है।
किसानों को बेचनी पड़ रही औने-पौने दामों में फसल
मुख्यमंत्री ने किसानों का एक-एक दाना खरीदने का वादा 15 अप्रैल से तय किया था। लेकिन एसएमएस नहीं मिलने और खरीदी प्रक्रिया में व्याप्त भर्राशाही के कारण, किसान औने-पौने दाम में अनाज बेंचने को मजबूर बना हुआ है। तीन-तीन दिनों तक किसानों का गेहूं नहीं तुल पा रहा है। कई खरीदी केंद्रों में बारदाना नहीं है, तो कहीं पर बारिश से बचाव के लिए तिरपाल आदि तक की व्यवस्था नहीं है। इसके चलते किसान काफी परेशान हैं। मजबूरी में किसान कम मूल्य पर गेहूं बेच रहे हैं। उन्हें भुगतान भी पूरा नहीं मिल पा रहा है। बेमौसम बारिश ने किसानों की जान सांसत में डाल रखी है और ऐसे में समर्थन केंद्र से किसानों का भुगतान भी नहीं हो रहा है।
श्रमिकों को राहत राशि का इंतजार
पंजीकृत निर्माण श्रमिकों के खातों में 88 करोड़ रुपये से अधिक की आपदा राशि ट्रांसफर की गई है। लेकिन अधिकांश को यह राशि नहीं मिली है। भाजपा के वरिष्ठ विधायक गोपाल भार्गव भी इस मामले में सवाल उठा चुके हैं।
नि:शुल्क राशन में आंकड़ेबाजी
मुख्यमंत्री द्वारा गरीब और जरूरतमंद को नि:शुल्क राशन देने के निर्देशों में अफसरों ने आंकड़ों का खेल कर दिया। उन आंकड़ो के हिसाब से प्रदेश में पौने छह करोड़ लोगों को राशन बांटा जा चुका है। हकीकत में आज भी लाखों गरीब राशन के लिए परेशान हो रहे हैं। यही नहीं देशभर में 1.95 लाख टन दाल बांटने की घोषणा की गई थी, लेकिन आज तक 19.49 हजार टन दाल ही बंट पाई है। इस मामले में प्रदेश काफी पीछे चल रहा है।
बिगड़ रही है सरकार की छवि
मुख्यमंत्री की घोषणाओं का जमीनी स्तर पर नहीं उतरने से सरकार और उनकी छवि भी खराब हो रही है। मंत्रालय और जिलों में पदस्थ अफसर इस मामले में लापरवाह बने हुए हैं। इसकी बड़ी वजह है उन्हें इसका अनुभव ही नही हैं कि लॉकडाउन के दौरान किस तरह से काम करना है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं के क्रियान्वय के जमीनी आंकलन की मांग जोर पकडऩे लगी है। आपदा के इस समय पर सरकार, अधिकारियों, कर्मचारियों के ऊपर सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है, कि जो भी निर्णय सरकार ले रही है। उनका पालन निश्चित समय पर बेहतर ढंग से हो। लॉकडाउन के दौरान जिस तरह से लोग परेशान हैं। घोषणा के बाद जब चीजें उन तक नहीं पहुंचती है, तो लोगों का गुस्सा बढऩा स्वभाभिक है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *