निकायों के पावर गेम में भाजपा कांग्रेस आमने सामने!

भले ही प्रदेश की भाजपा सरकार ने नगरीय निकायों में प्रशासकीय समितियों के गठन का फैसला कर लिया है, लेकिन अब तक उसका आदेश जारी नहीं होने से उस पर संशय के बादल नजर आने लगे हैं। दरअसल प्रशासकीय समितियों के माध्यम से सरकार अपने दल के नेताओं को उपकृत करना चाहती है। वजह है अधिकांश नगरीय निकायों पर पूर्व में उसके ही दल का कब्जा होना। उधर, सरकार के इस फैसले के विरोध में कांग्रेस खड़ी हो गई है। कांग्रेस ने इस मामले में कोर्ट जाने का मन बना लिया है। जिससे अब कांग्रेस व भाजपा इस मामले में आमने-सामने आते दिखना शुरु हो गए हैं। दरअसल नगरीय निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार निकाय चुनाव नहीं करा सकी, जिसके चलते उनमें प्रशासक बिठाने पड़े। अब सरकार नई व्यवस्था के तहत महापौर, अध्यक्ष और पार्षदों को 1 साल तक और पद पर बनाए रखने का फैसला कैबिनेट में कर चुकी है, लेकिन छह दिन बाद भी इसके आदेश जारी नहीं हुए हैं। बताया जा रहा है कि समिति के सदस्यों के अधिकारों को लेकर अधिनियम में पेंच आने से फिलहाल यह आदेश जारी नहीं किया जा रहा है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 21 अप्रैल को मंत्रिमंडल के गठन के तत्काल बाद पहली बैठक में यह फैसला किया था। इसके तहत ऐसे सभी नगरीय निकाय जिनकी समयावधि पूरी हो चुकी है, उनमें प्रशासकीय समितियों का गठन कर सभी निर्वाचित महापौर, अध्यक्ष और महापौर पार्षदों को 1 साल तक और बनाए रखना शामिल है। इनमें वे जनप्रतिनिधि ही शामिल किए जाएंगे जो किसी कारण से अयोग्य घोषित नहीं किए गए हों। समिति में संबंधित निकाय के महापौर और अध्यक्ष को ही समिति का अध्यक्ष बनाया जाना है। इसके साथ ही सभी पार्षदों को समिति के सदस्य बनाए जाना है। उधर, शिवराज सरकार द्वारा महापौर और पार्षदों को 1 साल और काम करने का मौका दिए जाने के निर्णय को लेकर पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा कोर्ट में जाने की चेतावनी दे चुके हैं। उनके द्वारा कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए अब सरकार के आदेश का इंतजार किया जा रहा है। इस वजह से ही सरकार फूंक फूंक कर कदम उठा रही है।
कांग्रेस ने नियुक्त किए थे प्रशासक
तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इन निकायों का कार्यकाल खत्म होने पर संभागीय मुख्यालय वाले नगर निगमों में संभागायुक्त को प्रशासक नियुक्त किया है। बाकी जिलों में कलेक्टर प्रशासक के रूप में काम देख रहे हैं। इसके अलावा नगर पालिका और नगर पंचायतों में निकाय मुख्यालय में पदस्थ रहने वाले एसडीएम और तहसीलदारों को प्रशासक बनाया गया है। जिस तरह पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने पंचायतों में जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल को 1 साल के लिए बढ़ा दिया गया था। वैसे ही प्रावधान नगरीय प्रशासन विभाग के अधिनियम में नहीं है। इस कारण इस आदेश को क्रियान्वित करने में दिक्कत आ रही है। वहीं जो रास्ता प्रशासकीय समिति के गठन का निकाला गया है ,उसमें किस तरह से अध्यक्ष और सदस्यों को अधिकार दिए जाएं यह भी फिलहाल तय नहीं हो पा रहा है। इसी कारण से अब तक आदेश जारी नहीं हो पाया है।

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